पामीस्ट्री के बारे में


‘हस्त सामुद्रीक’ इस शास्त्र का असली नाम ‘हस्त विज्ञान शास्त्र हैं। इस शास्त्र के मुख्यतः तीन विभाग हैं। पहले विभाग को हस्त लक्षण शास्त्र (cheirognomy) कहते हैं। इसें हाथ का आकार, हाथ का विभाजन, हाथ का रंग, हाथ की त्वचा, हाथ की ऊँगलियाँ, नाखून, अंगुठा एवम् ग्रहोंके ऊँचे स्थान (टीले) आदी समाविष्ट होते हैं। दुसरे विभाग को हस्त रेखा शास्त्र (chairognomy) कहते हैं। इसें हाथ की रेखाएँ समाविष्ट होते हैं। इन रेखाओंके ८ प्रमुख ८ एवंम निम्न रेखाएँ होती हैं।

हस्त विज्ञान शास्त्र

  • 1)हाथ का आकार एवंम् प्रकार
  • 2) हाथ का विभाजन
  • 3) हाथ का रंग, त्वचा, मजबुती।
  • 4) अंगुठा
  • 5) ऊंगलियाँ
  • 6) ऊंगलियो के नाखून
  • 7) हाथपर स्थित ग्रहोके टीले
  • 8) लचिलापण

हस्तरेखाशास्त्र
हाथपर स्थित छः मुख्य रेखाएँ

  • 1) आयुष्य रेखा
  • 2) अंतःकरण रेखा
  • 3) मस्तक रेखा
  • 4) भाग्य रेखा
  • 5) रवी रेखा
  • 6) स्वास्थ्य रेखा (बुध रेखा)



आठ गौण रेखाएँ

  • 1) मंगल रेखा
  • 2) विवाह रेखा
  • 3) वासना रेखा
  • 4) संतान रेखा
  • 5) यात्रा रेखा
  • 6) अंतज्र्ञान रेखा
  • 7) मणीबंध रेखा
  • 8) शुक्रकंकण

हस्तलक्षण शास्त्र
हाथ केमुलतः 7 भेद होते हैं। इसेंसे केवल पाँच प्रमुख हैं।
  • 1) चौकोना हाथ : सुव्यवस्थित, दूरदृष्टी, विवेक
  • 2) शंकूरूप हाथ : सौंदर्यदृष्टी एंव विषयासक्ती
  • 3) गांठयुक्त तथा तत्वज्ञानी हाथ :बुद्धीमत्ता एवं तत्वज्ञान
  • 4)अतीशंकू रूप हाथ : भावनाशिल, अव्यवहारी, सनकी
हाथ का रंग और त्वचा
  • 1) त्वचाका अत्यंत फिका रंग : स्वार्थी, दोमुँहा (चंचल)
  • 2) हल्के पिले रंग की त्वचा : मन की दुर्बलता, डरपोक
  • 3) सिंदुरियाँ एवमं रंगबिरंगी त्वचा : आनंदी एवम् उत्साही, सारासार विचार
  • 4) त्वचा का लाल रंग : गुस्सैल स्वभाव
  • 5) अती लाल (गहरी लाल) त्वचा : अत्यंत गुस्सैल स्वभाव
  • 6) मुलायम त्वचा : र्निमल, सहकार्य की भावना
  • 7) रूक्ष त्वचा : कडापण
  • 8) सर्दीयुक्त त्वचा : नितीमुल्योकी कमीं, स्वार्थ त्याग
अंगुठा
हस्तसामुद्रीक शास्त्र में अंगुठेका असाधारण महत्व हैं। अंगुठेसे मनुष्यकी इच्छाशक्ती का ज्ञान होता हैं। अंगुठे के दो प्रकार हैं
  • 1) बडा अंगुठा : तिव्र इच्छाशक्ती, आत्मविश्वास करारापण शहाणपण वैचारिक कृतिशिलता
  • 2) छोटा अंगुठा : चंचल स्वभाव सहनशिल भावनाशिल मन¨विकार अल्पबुद्धी बेचैन
  • 3) सिंदुरियाँ एवमं रंगबिरंगी त्वचा : आनंदी एवम् उत्साही, सारासार विचार
  • 4) त्वचा का लाल रंग : गुस्सैल स्वभाव
  • 5) अती लाल (गहरी लाल) त्वचा : अत्यंत गुस्सैल स्वभाव
  • 6) मुलायम त्वचा : र्निमल, सहकार्य की भावना
  • 7) रूक्ष त्वचा : कडापण
  • 8) सर्दीयुक्त त्वचा : नितीमुल्योकी कमीं, स्वार्थ त्याग
ऊंगलियाँ
  • 1) गुरू की ऊंगली : गुरू की ऊंगली से स्वाभिमान, महत्वाकांक्षा, अधिकार, धार्मिकता, प्रतिष्ठा ईन बातोंका ज्ञान होता हैं।
  • 2)शनि की ऊंगली : हाथ की बीचवाली ऊंगली शनिकी होती हैं। यह ऊंगली सबसे लंबी होती हैं। यह ऊंगली अत्याधिक लंबी होणेपर गंभीर स्वभाव दर्शाती हैं; किन्तु यह ऊंगली छोटी होनेपर बालीशपण तथा अश्लिलता दर्शाती हैं।
  • 3) रवी की ऊंगली : रवी की ऊंगलीसे व्यक्ती का कला प्रेम और निसर्गप्रेम समझमें आता हैं। रवी की ऊंगली अगर गुरू की ऊंगलीसे लंबी हो तो ऐसे मनुष्य की जुआरी प्रवृत्ति होती हैं। ऐसी व्यक्तिमें आत्मविश्वास होता हैं।
  • 4) बुध की ऊंगली :छगुनी कोही बुध की ऊंगली कहते हैं। यह ऊंगली हाथ की सबसे छोटी ऊंगली होती हैं। यह ऊंगली अगर ज्यादाही लंबी हो , तो ऐसे मनुष्यका वकृत्व अच्छा होता हैं। छगुनी लंबी हो तो दूरदर्शी, विद्वान होणेकी इच्छा होती हैं। छगुनी चौड़ी हो , तो व्यापारी दृष्टी और पैसा हासिल करणे की इच्छा होती हैं।
हाथपर ग्रहोके पर्बत
  • गुरू का पर्बत : 1) स्वाभिमान 2) महŸवाकांक्षा 3) धार्मिकता 4) नितिमत्ता 5) प्रतिष्ठा 6) प्रेम 7) कतृŸव 8) उत्साह 9) नेतृव
  • डशनि का पर्बत : 1) सहनशिलता 2) गंभीरता 3) न्यायप्रियता 4) विद्वत्ता 5) मेहनती 6) शहाणपण 7) नका संतुलन 8) धर्मभोलापण
  • रवी का पर्बत :1) कला 2) चतुरता 3) बुद्धीमत्ता 4) यश 5) वक्तृव् 6) स्वतंत्रवृत्ति 7) उत्साह 8) सभी कलाओें निपुण 9) सफल 10) स्फूर्ती
  • बुध का पर्बत : 1) शास्त्रीय संशोधन 2) उद्योगी 3) व्यापार वृत्ति 4) धूर्तता 5) चतुरता 6) शिघ्र निर्णय 7) चपलता 8) मनुष्य की पहचान
  • मंगल का पर्बत :1) आक्रमक वृत्ति 2) लढाऊ वृत्ति 3) लढणेकीवृत्ति 4) करारापण 5) हिंत 6) उत्साह 7) ऊदार वृत्ति 8) अन्याय के प्रती चिढ
  • चंद्रा का पर्बत : 1) स्वप्नील वृत्ति 2) आदर्शवादी 3) काल्पनिक 4) यात्रों रूची 5) गुढ विद्या का आकर्षण 6) शितल स्वभाव 7) सनकी स्वभाव 8) स्वार्थी
  • शुक्र का पर्बत : 1) सौंदर्य 2) रोग प्रतिकार शक्ती 3) प्रेम 4) कला 5) उत्साह 6) मोहक व्यक्तीत्व 7) ऊदार 8)सौंदर्यप्रेम 9) संगितमें रूची 10) प्रभावी वासना
  • हर्षल का पर्बत : हर्षल टीला यह जीवन की घटनाएँ, साथही अचानक हाणेवाले बदल दर्शाता हैं।

    1) कृतिशिलता, 2) बुद्धीमान 3) बदलाव लाने की प्रवृत्ती ।

  • नेपच्यून पर्बत : इस टीलेके गुणर्ध चंद्र ग्रह के टीलेके समानही होते हैं।
हस्तरेखा शास्त्र
  • हाथ की लकीरोसे केवल स्वभाव का ही वर्णन बताया नहीं जाता, बल्की व्यक्ती का भुतकाल, वर्तमान तथा भविष्यकालभी बताया जाता हैं। हाथ के रंग से रेखाओं का रंग मेल-जोल खाता होना चाहिए। देश के मौसम के अनुसार एवंम् व्यक्ती के स्वयं के रंगानुसार रेखाओके रंग में थोडा- बहुत अंतर होता हैं। हाथ की लकीरे अगर बिचमें टूटी हुई हो , तो जीवनें उतार- चढाव संभव होते हैं। हाथपर छः प्रमुख एवम् आठ गौण रेखाएँ होती हैं।
  • 1) हृदय रेखा : इस रेखासे व्यक्ती की भावनाएँ, प्रेम, संस्कार आदी बाते ज्ञात होती हैं। यह रेखा जितनी सिधी हो , हो उतनीही ऊस व्यक्ती की भावनाएँ स्त्री स्वभाव (को मल) की होती हैं और ऊसी के अनुसार उसें व्यावहारिक (आचरणसे संबंधीत) गणित होते हैं। इसके विपरित रेखामें जितना टेढापण होगा, ऊतनीही वह व्यक्ती पुरूष प्रवृत्ति की एवम् भावूक होती हैं।
  • 2) मस्तक रेखा : मस्तक रेखासे मनुष्य की अंगभूत ग्रहणशक्ती, ऊसकी बुद्धीमत्ति , कल्पकता और ऊसकी चतुरता, उसका आम दृष्टी कोण इन सभी बातोंका ज्ञान होता हैं। मस्तकरेखा सिधी होती हैं। अगर वह छोटी हो , तो ऊसके व्यक्तित्व कम विकसित माना जाता हैं। कुछ हद तक रेखा सिधी होनेकेबावजूद एकदम से निचे की ओर जा रही हो , तो सनकी, चत्कारिक एवम् बेचैन (चंचल) स्वभाव का दर्शन होता हैं। ऐसी व्यक्ती विवेकहीन होती हैं।
  • 3) आयुष्य रेखा :आयुष्य रेखासे शारिरिक बल, स्वास्थ्य की मजबुती, अलग-अलग समयमें स्वास्थ्य एवम् प्रकृतीें बिगाड का कालावधी, दुर्घटनाएँ, आफत, शारिरिक ऊत्साह, आत्मविश्वास, हिंमत, जीवनमें आए ऊतार- च ढाव इन प्रमुख बातोका ज्ञान होता हैं। प्रत्येक व्यक्ती की यह रेखा अलग होती हैं। यह रेखा संकरी होनेंपर ऐसे नहीं की आयु कम होती हैं; बल्की ऊसने जीवन का भलीभाँती ऊपभोग लिया नहीं होता हैं।
  • 4) भाग्य रेखा :भाग्य रेखा का उद्गम् हाथ के निचली ओर से होता हैं और वह सिधे शनि के टीले की ओर जाती हैं। कई बार भाग्य रेखा का अन्त अन्य टीलोपर भी होता हैं। इस रेखासे व्यक्ती के कर्तुत्व की कल्पना की जा सकती हैं। साथही इस रेखा से ऊसकी समाजप्रियता भी सझमें आती हैं। व्यवसाय, नोकरीें आनेवाले ऊतार- चढाव इस रेखाद्वारा सझमें आते हैं।
  • 5) रवी रेखा :हाथपर कलाईसे शुरू होकर हाथ के रवी टीले तक जानेवाली रेखा क¨ रवी रेखा कहा जाता हैं। हाथपर रवी रेखा ह¨नेंपर ऐसे व्यक्ती को बुद्धिमत्ता की देन होती हैं और ऊसी के बलपर व्यक्ती के नसिब के रहस्य-भेद खोले जाते हैं। ऐसे व्यक्ती का प्रसन्न व्यक्तिमहत्व होता हैं। रवी रेखा ऊस व्यक्ती को मिलनेवाली सफलता दर्शाती हैं। रवी रेखा के कारण व्यक्तीें ग्रहणशक्ती, आशावाद, सिखने की चाह, कलासक्त स्वभाव आदी गुण आते हैं।
  • 6) बुध रेखा : बुध रेखा कोही स्वास्थ्य रेखाभी कहते हैं। इस रेखा के हाथपर ना होनेसे स्वास्थ्य अच्छा होता हैं। यह रेखा जहाँ आयुष्य रेखासे मिलती है, ऊतनीही आयु होती हैं। इस रेखासे व्यावसायिक जीवन के ऊतार- चढाव भी सझमें आते हैं। यह रेखा हाथपर स्पष्ट एवम् दोषरहित होनेपर सफलता और संपत्ति दर्शाती है । इसीप्रकार ऊत्कृष्ट स्वास्थ्य भी दर्शाती हैं ।
आठ गौण रेखाएँ
  • 1) मंगल रेखा : निचले मंगल टीलेसे शुरू होकर आयुष्य रेखासे समानांन्तर होते हुए शुक्र टीलेपर जाती हैं। इसे संरक्षण रेखा, संघर्ष रेखा, युद्ध रेखा भी कहा जाता हैं। जिस व्यक्ती के हाथपर मंगल रेखा होती हैं, ऊसका शौर्य, प्रतिकार शक्ती विलक्षण होती हैं। अवमान अथवा हवी होने की चाहत रखनेवाले को यह सह नहीं पाते।
  • 2) विवाह रेखा : बुध के टीले के निचे और हृदय रेखा के ऊपर स्थित आडी रेखा इन दोने केबीचें स्पष्ट दिखाई देनेवाली विवाह रेखा होती हैं। विवाह रेखा अगर एकही हो तो वह अच्छा होता हैं।
  • 3) वासना रेखा : वासना रेखा को स्वास्थ्य रेखा की सहायक रेखा माना जाता हैं। तलवे के निचले हिस्सोमै उद्गम पाकर यह निचे मणिबंध रेखा की ओर जाती हैं। यह रेखा अशुभ मानी जाती हैं। वासना रेखापर नक्षत्रचिन्ह हो , तो सफलता एवमं सधनता दर्शाती हैं।
  • 4) संतान रेखा : विवाह रेखापर खडी छोटी-छोटी रेखाएँ संतान रेखा कहलाती हैं। इन रेखाओकि स्थिती कैसी है और वह ग्रह टीले के किस हिस्से को स्पर्श करती हैं, यह देखकर ऊस व्यक्ती को पुत्र हो गा या पुत्री, ऊन बच्चोका स्वास्थ्य अच्छा होगा या बुरा, तथा यह बच्चे ऊनके जीवनें कुछ विशेष महत्वपूर्ण का कर पाएगे या नहीं, इन सभी बातोका ज्ञान हो सकता हैं।
  • 5) यात्रा रेखा : चंद्र ग्रहपर स्थित आडी रेखाओकि यात्रा रेखा कहा जाता हैं। इसीप्रकार कलाईपर स्थित खडी रेखाओकि भी यात्रा रेखा कहते हैं। चंद्र के टीलेपर की कुछ रेखाएँ विदेश यात्रा अथवा जलयात्रा दर्शाती हैं। यह रेखाएँ लम्बी होनेपर यात्रा भी दूर की होती हैं।
  • 6) अंतज्ञान रेखा : चंद्र ग्रहसे बुध ग्रह की ओर जानेवाली अर्धगोलाकार रेखा अंतज्र्ञान रेखाहोती हैं। यह रेखा अगर हो , तो वह केवल तत्वज्ञ केवल तत्त्व , कुछ-कुछ शंकुरूप अथवा अत्यंत शंकुरूप हाथपरही होती हैं। जिस व्यक्ती के हाथ पर यह रेखा है , ऊसे अतिसुक्ष्म संवेदनाओकी की देन प्राप्त होती हैं। ऐसे लोगोको किसी अज्ञात, रहस्यमयी शक्तीद्वारा अथवा ज्ञानद्वारा दुसरोसे संबंधीत भविष्यें होणेवाली घटनाओका अहसास पहलेही होता हैं।
  • 7) मणिबंध रेखा : तलुवे के निचे कलाईपर स्थित आडी रेखाओकी मणिबंध रेखा कहते हैं। मणिबंध रेखासे आयुष्यमान एवम् अच्छा नसिब इनका ज्ञान होता हैं। गुलाबी रंग की तीन मणिबंध रेखाएँ होनेपर ऐश्वर्य, स्वास्थ्य तथा मनकी शांती लिती हैं। यह तीन रेखाएँ साफ और स्पश्ट ह¨नेपर दिर्घायु दर्शाती हैं तथा आयुष्य रेखा संकरी होनेपर भी ऊसके दोष नही जाते हैं।
  • 8) शुक्रकंकण : जो लोग अत्यंत संवेदनशिल, बुद्धीमान और चंचल मनोवृत्ति के तथा भावूक होते है, ऐसे लोगो के हाथपर शुक्रकंकण रेखा देखने मिलती हैं। यह रेखा गुरू और शनि ग्रह के बिचसे निकलकर बुध और रवी ग्रह के बीच जाकर मिलती हैं। जिनके हाथपर यह शुक्रकंकण रेखा होती है, ऐसे लोग किसी ना किसी मानसिक तणाव का शिकार होते हैं।
Copyright © 2017 palmistryresearch.com. All rights reserved. Design by Ultraliant Pvt Ltd
Ask Question